सोमवार, 29 अगस्त 2011

खुद को बदलो दुनिया स्वत: बदल जाएगी

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। मानव सम वानर से होमोसेपियन तक की मानव की यात्रा अनेकों शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तनों की महागाथा है।विश्व में अनेकों देश हैं जिनमें सहस्त्रों सभ्यताओं एवं संस्कृतियों का जन्म हुआ और समय के साथ उनका पतन भी हुआ। प्रत्येक संस्कृति की उत्पत्ति एवं उसका पतन तत्कालीन प्राकृतिक,भौगौलिक,सामाजिक एवं आर्थिक कारकों पर निर्भर करती है। जहां सकारात्मक परिस्थिति संस्कृति के उत्थान में सहायक होती है वहीं नकारात्मक परिस्थिति पतन को निश्चित कर देती है। यही बात मानव के स्वभाव एवं चरित्र पर भी अक्षरश: लागू होती है। मानव चरित्र में आया थोड़ा सा भी परिवर्तन भी महान सामाजिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार कर देता है। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि प्राचीन काल में,विशेषत: वैदिक काल में,स्त्रियों की सामाजिक स्थिति अत्यंत उच्च थी । किसी भी परंपरागत कृत्य में स्त्रियॉं की उपस्थिति अपरिहार्य थी । परंतु कालांतर में विदेशी आक्रमणों से स्वयं को सुरक्षित रखने की लालसा तथा मानव चरित्र में आए नैतिक पतन के फलस्वरूप स्त्रियाँ भोग की वस्तु बनकर रह गईं । बाल-विवाह,विधवा पुनर्विवाह निषेध,दहेज हत्या एवं अन्य प्रकार की घरेलू हिंसा मानव के चारित्रिक पतन के कुछ उदाहरण मात्र हैं। वर्तमान में स्त्रियों की स्थिति में कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है।वे पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहीं है,इस परिवर्तन के पीछे कानूनी डंडा एक प्रत्यक्ष कारण अवश्य है परंतु सामान्य जनों में आए नैतिक एवं चारित्रिक परिवर्तन सबसे बड़े अप्रत्यक्ष कारण के रूप में उभरते हैं क्योंकि कोई भी व्यवहार , प्रथा या परंपरा में तभी परिवर्तित होता है जबकि उसका निर्वहन सामान्य जनता के बाहुल्य द्वारा नियम के रूप में किया जाता है और स्वेक्षया अपनाया जाता है। वर्तमान युग को अर्थ युग की संज्ञा दी जाती है क्योंकि आर्थिक संपन्नता एवं विपन्नता ही राष्ट्र,राज्य एवं व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का निर्धारण करती हैं। ऐसा नहीं है कि प्राचीन समय में अर्थ की प्रधानता नहीं थी,हालांकि उस समय भी आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन धन ही था परंतु उस समय आवश्यकताएँ सीमित थीं परिणामत: अर्थ का सीधा प्रभाव मानव की चारित्रिक विशेषताओं पर नहीं पड़ता था।वर्तमान में हमें जिस धन-लोलुपता और भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ रहा है उसका प्रमुख कारण मानव चरित्र में घर कर गई अर्थ की प्रधानता की भावना ही है। यदि इस विश्व को मानव रूप में मान लिया जाए तो जिस प्रकार शरीर की इकाई कोशिका होती है उसी प्रकार विश्व की इकाई व्यक्ति को माना जा सकता है।शरीर की कार्यप्रणाली मुख्यत: कोशिकाओं पर ही निर्भर करती है उसी प्रकार संसार की कार्य प्रणाली व्यक्ति रूपी इकाई पर निर्भर करती है। इस प्रकार यदि व्यक्ति रूपी इकाई की सोच में आए सकारात्मक या नकारात्मक परिवर्तनों का निश्चित प्रभाव समाज पर भी पड़ता है।यह माना कि अकेला चना भाड़ नहीं झोंक सकता परंतु एक नई शुरुआत तो कर सकता है। यही परिवर्तन का प्रथम चरण होता है। ज्ञानी को गुण दिखाई देते हैं और अज्ञानी की दृष्टि सदैव दोषों पर रहती है। वस्तु अच्छी या बुरी नहीं होती, हमारे देखने के तरीके अच्छे या बुरे होते हैं। हमारी दृष्टि अच्छी है तो सारी सृष्टि हमें सुंदर नजर आएगी, यदि हमारी दृष्टि खोटी है तो सारी सृष्टि में हमें मात्र खोट ही नजर आएगा। दृष्टि बदलो सृष्टि अपने-आप बदल जाएगी। यह समाज एक दर्पण के समान होता है जैसा हमारा स्वरूप होता है वैसा ही संसार हमें दृष्टिगोचर होता है परंतु स्वयं को बदलना कठिन मानसिक प्रक्रियाओं के दौर से गुज़रना होता है। परंतु किसी भी महान लक्ष्य की प्राप्ति सरलता से नहीं होती उसके लिए आकाश पाताल एक करना पड़ते हैं। सरलता से प्राप्त वस्तु का कोई मोल नहीं होता है। जिस आज़ादी का भोग हम आज कर रहे हैं उसकी प्राप्ति भी सरलता से नहीं हुई है इसी लिए आज यह आवश्यक हो गया है कि प्रत्येक व्यक्ति आत्म मंथन करे और यह शपथ ले कि जिन उच्चादर्शों को सामने रखकर आज़ादी प्राप्त की गई है उनका पालन करे तथा उन्हे अपने में आत्मसात करे।हाल ही में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ सम्पन्न अन्ना का आंदोलन तब तक सफल नहीं होगा जब तक कि प्रत्येक व्यक्ति में अंतर्निहित भ्रष्टाचार की आदत समाप्त नहीं होती। जी हाँ आज भ्रष्टाचार आदत का स्वरूप ले चुका है और कोई भी आदत सरलता से पीछा नहीं छोड़ती,इसे छुड़ाने के लिए भी क्रान्ति की आवश्यकता होती है जिसे आत्म-क्रान्ति की संज्ञा दी जा सकती है।है।इसी लिए प्रथम आवश्यकता स्वयं को बदलने की है , हमारे बदलने से ही दुनियाँ के बदलने की बात सोची जा सकती है।

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

कश्मीर और आज़ादी .....???

कश्मीरियों की यह आम शिकायत रहती है कि शेष भारत वाले कश्मीर और कश्मीरियों को सही से समझते नहीं। किसी हद तक यह सही भी है। कश्मीर के विषय में कई मिथकों में से एक मिथक यह तोड़ने की आवश्यकता है कि कश्मीर भारत का एक उत्तरी राज्य है। जी नहीं, कश्मीर एक राज्य नहीं बल्कि जम्मू कश्मीर राज्य का एक छोटा सा हिस्सा है – 6.98 प्रतिशत हिस्सा। यहाँ तक कि यह कहना भी ग़लत है किकश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है”, क्योंकि कश्मीर तो भारत का सब से उत्तरी भाग है ही नहीं। वह श्रेय लद्दाख सूबे को जाता है। और यदि भारत का आधिकारिक मानचित्र देखा जाए तो गिलगित और अक्साइ-चिन उससे भी उत्तर में हैं। लद्दाख, गिलगित, अक्साइ चिन कश्मीर का हिस्सा हैं। जिस क्षेत्र को पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर कहता है, और हम पाक-अधिकृत कश्मीर, वह क्षेत्र भी दरअसल कश्मीर नहीं है। यह लेख प्रयास है यह बतलाने कि इन अंतरों को समझना क्यों ज़रूरी है, विशेषकर जब कश्मीर घाटी में इतना हंगामा हो रहा है।

राजनीतिक शतरंज के खिलाड़ियों ने कश्मीर की भौगौलिक स्थिति और सीमाओं को लेकर हमेशा एक भ्रामक स्थिति बनाए रखी। आम तौर पर जब लोगों से पूछा जाता है कि कश्मीर कहाँ है, तो वे कहते हैं, “यह रहाऔर भारत के मानचित्र केसिरकी ओर इशारा करते हैं, जैसा कि ऊपर दिये मानचित्र में काले बाणचिह्न से दिखाया गया है। पर वास्तव में वे सचाई से कोसों दूर हैं। इसी नक्शे में लाल बाणचिह्नों के द्वारा लेखक ने कश्मीर की सही स्थिति और सीमा दिखाई है।
ऊपर दिए नक्शे में भारत की सरकारी रूप से मान्य सीमाएँ दिखाई गई हैं, और कश्मीर क्षेत्र को लाल रेखाओं द्वारा रेखांकित किया गया है। यदि आप एकबाहर वालेके नज़रिए से देखना चाहें तो विकिपीडिया का दाएँ दिया नक्शा देखेंइसे क्लिक कर बड़े आकार में देखा जा सकता है। कश्मीर घाटी की सीमाएँ इस नक्शे में भी लाल रेखाओं द्वारा दिखाई गई हैं।
आप पूछेंगे कि कश्मीर और जम्मू-कश्मीर राज्य में भला क्या अन्तर है? यूँ समझें कि सारा झगड़ा कश्मीर का है जम्मू-कश्मीर का नहीं। कश्मीर सुन्नी-मुस्लिम बहुल है, राज्य के अन्य भाग नहीं। कश्मीर मेंगो इंडिया गोका नारा लग रहा है, जबकि राज्य के अन्य भाग भारतीय होने में खुश हैं। कश्मीर जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा हिस्सा है।
आप स्वयं ही इन क्षेत्रफलों की तुलना कीजिए :
कश्मीर का क्षेत्रफल : 15,520.3 वर्ग किमी (विकिपीडिया)
भारत के नियन्त्रण में जम्मू-कश्मीर का क्षेत्रफल : ~101,400 वर्ग किमी (वन सर्वेक्षण की साइट)
अविभाजित जम्मू-कश्मीर का कुल क्षेत्रफल : 222,236 वर्ग किमी (विकिपीडिया)
यानी कश्मीर अविभाजित जम्मू-कश्मीर राज्य का लगभग 7% है, और भारत के अन्तर्गत जम्मू-कश्मीर का लगभग 15%
पर कश्मीर की परिभाषा क्या है? अच्छा हो कि कश्मीरियों से ही पूछा जाए। कश्मीरी भाषा में घाटी से बाहर के क्षेत्र कोन्यबरकहा जाता है, यानी बाहर या परदेस। कश्मीर उस जम्मू-कश्मीर राज्य का एक छोटा सा हिस्सा है, जो जम्मू, लद्दाख और कश्मीर को मिला कर बना है। राज्य के तीन सूबे हैं जिनमें कश्मीर सूबा सब से छोटा है। और इस छोटू ने ही सब की नाक में दम कर रखा है। इस क्षेत्र में केवल तीन जिले थेअनन्तनाग, बारामुल्ला और श्रीनगर, जिन्हें अब दस छोटे जिलों में बाँट दिया गया है। इसी छोटे से क्षेत्र ने पिछले 63 वर्षों में इस इलाके की राजनीति पर अपना बोलबाला कायम किया है।
कश्मीर और जम्मू-कश्मीर के इस अन्तर को हमेशा छुपाया क्यों गया है, और इस अन्तर को उजागर करना क्यों आवश्यक है? दरअसल राज्य का यही छोटा हिस्सा भारत के लिए दर्दे-सर बना हुआ है, क्योंकि इस मुस्लिम बहुल क्षेत्र ने पूरे राज्य को और पूरे क्षेत्र को अपहृत कर रखा है। राज्य का यह भाग जो राज्य का केवल 7% है, स्वयं को एक गैर मुस्लिम देश का भाग मानने में आनाकानी करता है। राज्य के दक्षिण में जम्मू है, जो हिन्दू-बहुल है, जहाँ के लोग पंजाब-हिमाचल जैसे हैं, और उत्तर में लद्दाख है जहाँ बौद्ध और शिया मुस्लिम रहते हैं, कुछ कुछ तिब्बत से मिलता जुलता। दोनों क्षेत्रों को भारत का भाग होने में कोई दिक्कत नहीं है। केवल कश्मीर है, जहाँ गैर-मुस्लिमों के पलायन के बाद अब 97% आबादी मुसलमानों की है। यही वह हिस्सा है जो आग का गोला बना हुआ है। वह खूबसूरत वादी, जिसे कभी जन्नत कहा जाता था, और जिसे अलगाववाद ने जहन्नुम में तब्दील कर दिया गया है। इसी क्षेत्र के अधिकांश वासी इस छोटे से क्षेत्र के लिए आज़ादी की माँग कर रहे हैं। इस राज्य की विविधता, भारत की विविधता में तो घुलमिल जाएगी, पर हरे-झंडे ले लेकर पत्थर बरसाते अलगाववादियों के कश्मीर में कैसे चलेगी?
पाक अधिकृतकश्मीरमें कश्मीरी रहते हैं, वहाँ कश्मीरी बोली जाती है। वहाँ बोली जाने वाली भाषाओं में से एक भी भाषा कश्मीरी से नहीं मिलती जुलती। जाहिर है कि नियन्त्रण रेखा ने किसी परिवार को विभाजित नहीं किया।
इस खेल के हर खिलाड़ी के लिए महाराजा हरिसिंह की इस रियासत के ईंट-रोड़े को इकट्ठा रखना एक राजनैतिक मजबूरी रही हैचाहे वह कहीं की ईंट हो कहीं का रोड़ा। जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में कुछ भी एक सा नहीं है, सिवाय इसके कि यह तीनों सूबे एक ही राजा के अन्तर्गत थे। हर क्षेत्र की अपनी वांशिकता है, अपना मज़हब, अपनी भौगोलिक स्थिति और प्रवृति, अपनी जलवायु, अपनी संस्कृति और अपनी भाषा। देश में किसी भी राज्य में इतनी विविधता नहीं है। यहाँ तक कि 1950 के दशक में देश का भाषाई पुनर्गठन तो हुआ पर इस राज्य को नहीं छुआ गया, क्योंकि इसे विशेष स्टेटस हासिल था। भारत शायद इस राज्य को इसलिए इकट्ठा रखना चाहता है कि जम्मू और लद्दाख कश्मीर और शेष भारत के बीच गोंद का काम करें। भारत को लगता है कि राज्य का विभाजन किया तो देश का विभाजन दूर नहीं होगा। पाकिस्तान भी जम्मू-कश्मीर का नाम एक साथ लेता है ताकि वह पूरे राज्य पर अपना दावा ठोक सके और नौबत पड़ने पर शायद हिन्दू क्षेत्रों की सौदेबाजी कर सके। शायद इसी कारण वे अपने हथियाए हुए इलाके को AJK (आज़ाद जम्मू कश्मीर) कहते हैं, जो आज़ाद है, जम्मू है, कश्मीर है। पाक अधिकृतकश्मीरमें कश्मीरी रहते हैं, वहाँ कश्मीरी बोली जाती है। वहाँ बोली जाने वाली भाषाएँ हैंपहाड़ी, मीरपुरी, गुज्जरी, हिन्दको, पंजाबी और पश्तो (विकिपीडिया के अनुसार) इन में से एक भी भाषा कश्मीरी से नहीं मिलती जुलती। इस का अर्थ यह भी है कि नियन्त्रण रेखा ने किसी परिवार को विभाजित नहीं किया है।
पर कश्मीरी अलगाववादियों की क्या मजबूरी है कि वे जम्मू-कश्मीर राज्य की बात कर रहे हैं, जबकि उन्हें केवल कश्मीर क्षेत्र से ही सरोकार है? जब कश्मीरी मुसलमान भारत का हिस्सा होने के विरुद्ध तर्क देते हैं तो कहते हैं कि वे भारतीयों से वांशिक रूप से अलग हैं, उनका धर्म अलग है। उन में से अधिकांश स्वयं को भारतीय नहीं मानते। कश्मीर के मुसलमान डोगरा राजा हरिसिंह के खिलाफ तो 1947 से भी पहले लड़ रहे थे। तो अब वे जम्मू-कश्मीर की बात कैसे कर रहे हैं? वे महाराजा के जीते अन्य क्षेत्रों पर कैसे दावा ठोक सकते हैं, जब वह महाराजा ही उनके लिए पराया था? लद्दाख, बल्तिस्तान और गिलगित तो उस समय रियासत का हिस्सा भी नहीं थे, जब डोगरा राजाओं ने जम्मू कश्मीर को अंग्रेज़ों से खरीदा। लेखक के विचार में कश्मीरियों के इस रवैये के दो कारण हैंपहला तो यह कि इस तरह वे कह सकेंगे कि हमें इस्लामी पाकिस्तान नहीं चाहिए बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष जम्मू-कश्मीर चाहिए, इससे उन्हें विश्व में सुनवाई मिलेगीक्योंकि पाकिस्तान और इस्लामी आतंकवाद दुनिया भर में बदनाम हो चुके हैं। दूसरा, इससे उन्हें सौदेबाजी भी करने के लिए जगह मिल जाती है।
कश्मीर का जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा अंश होना एक ऐसा तथ्य है जिस के और भी कई अर्थ निकलते हैं। अब चूँकि जम्मू और लद्दाख भारत के साथ खुश हैं, उनके ऊपर तो तथाकथितआज़ादीनहीं थोपी जा सकती। बाकी रहा कश्मीर का 6000 वर्ग मील का क्षेत्रफल। यदि इसे एक अलग देश बनाया जाता है, तो यह विश्व के सब से छोटेलैंड लाक्ड” (ऐसे देश जिनकी कोई सीमा समुद्र से नहीं मिलती) देशों में से होगावैकिटन सिटी, लक्समबर्ग और एकाध ही देश इससे छोटे होंगे। अब आप ही सोचिये कि भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच फंसे इस देश कीआज़ादीकितने दिन चलेगी? भारत से छुटकारा पाएँगे तो पाकिस्तान निगल जाएगा। दरअसल कश्मीर के कुछ नेता और बेशक पाकिस्तान भी तो मूलतः यही चाहते हैं, पर क्या कश्मीर की आम जनता इसी अंजाम के लिए लड़ रही है? क्या पाकिस्तान उन्हें धारा 370 जैसे विशेषाधिकार देगा? क्या वहाँ भी तालिबानी हुकूमत चलने लगेगी? इतने छोटे से भूमि क्षेत्र में क्या इतने प्राकृतिक संसाधन हैं कि यह एक देश बना रहे? जाड़े के महीनों में कश्मीर बर्फ से घिरा रहता है। समुद्र की बात छोड़ें, सड़क से भी वहाँ पहुँचना दूभर हो जाता है। जम्मू श्रीनगर राजमार्ग बन्द हो जाता है तो कश्मीर में खाने के लाले पड़ जाते हैं। बीबीसी का यह पृष्ठ देखें जिस में बताया गया है कि वादिए-कश्मीर आज़ाद की गई तो केवल 1800 वर्ग मील होगी, यानी भूटान का दसवाँ हिस्सा। यह क्षेत्रफल विकिपीडिया पर दिए क्षेत्रफल से काफी कम है, पर जो भी है इस छोटे से क्षेत्र के देश बनने की कल्पना, वह भी ऐसे माहौल में, किसी का भी भला नहीं करेगा।
लोकतन्त्र में बहुमत की चलती है, तो राज्य के 7-15% क्षेत्रफल में बसी जनसंख्या पूरे राज्य की बाबत फैसला क्यों करे? कठुआ के किसी डोगरी भाषी या लेह के किसी बौद्ध को तो निज़ामे-मुस्तफा की चाहत नहीं है।
कश्मीर का जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा अंश होना इस बात को भी झुठलाता है कि लोकतन्त्र होने के नाते बहुमत की बात मानी जानी चाहिए। बिल्कुल सही है, लोकतन्त्र में बहुमत की ही चलती है, पर राज्य के 7-15% क्षेत्रफल में बसी जनसंख्या क्या पूरे राज्य की बाबत फैसला करेगी? क्या यह लोकतन्त्र के खिलाफ नहीं होगा? कठुआ में रह रहे एक डोगरी भाषी या लेह में रह रहे किसी बौद्ध को तो निज़ामे-मुस्तफा (इस्लामी शासन) की चाहत नहीं है। कश्मीर तीन ओर से उन क्षेत्रों से घिरा है जो बेशक भारतवादी हैं, और चौथा यानी पश्चिमी सिरा पाकिस्तान ने हथिया रखा है। एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश के लिए कोई इलाका कितना बड़ा होना चाहिए जिस के आधार पर इसके निवासियों को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया जाए? लोकतन्त्र के नाते, क्या अब इसके बाद हैदराबाद या मेरठ के किसी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में रायशुमारी करनी पड़ेगी? कश्मीरी हिन्दुओं की माँग है कि यदि कश्मीरी मुसलमानों उन्हें अपने साथ नहीं रहने देते तो उन्हेंपनुन कश्मीर” (अपना कश्मीर) के नाम से कश्मीर के एक हिस्से में बसाया जाए जो भारत का अभिन्न अंग हो। यदि इस बात को बल दिया जाता है तो कश्मीरी अलगाववादियों के पासदेशके नाम पर और भी कम क्षेत्र बचता है।
यदि इतिहास की घड़ी को पीछे धकेला जा सकता तो शायद यह सही रहता कि महाराजा हरिसिंह ने कश्मीर घाटी को अलग कर पाकिस्तान को सौंप दिया होता। पर राज्य की घुलमुल संरचना के कारण ऐसा नहीं हो सका। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न आकांक्षाएँ थीं, सो उन्होंने राज्य को भारत पाकिस्तान दोनों से अलग रखा। उसके बाद पाकिस्तानी कबाइलियों ने जो किया वह सर्वज्ञात है। पर हाँ उस समय यदि वादी पाकिस्तान के हवाले कर दी जाती तो शायद सब के लिए बेहतर होता। कश्मीरी हिन्दू तभी भारत का हिस्सा बन गये हो, पाकिस्तान से आसे अन्य हिन्दूओं की तरह। कश्मीरी मुसलमान खुश होते या नहीं, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। पर बेशक कोईआज़ादी की लड़ाईतो नहीं चल रही होती।
अलगाववादियों को धर्मनिरपेक्षता, आज़ादी और जम्मू-लद्दाख की चिन्ता का ढ़ोंग तो छोड़ देना चाहिये। कश्मीर घाटी का मर्ज़ एक कैंसर का रूप धारण कर चुका है। घातक मर्ज़ के लिए दवा भी घातक चाहिए। कोई भी चरम उपाय होगा तो पूरे शरीर को तकलीफ तो होगी ही। या तो बीमारी का उपचार किया जाय या विष ग्रसित अंग को ही शरीर से पृथक कर दिया जाय। दर्दनाक बात है पर वाकई कश्मीर का आकार इतना छोटा है कि इसके ना होने पर भारत के मानचित्र में कोई बहुत ज़्यादा अन्तर नहीं पड़ेगा। घाटी को या तो देश में पूरी तरह समाहित करना चाहिये (दफा 370 हटाकर) या फिर पूरी तौर से दफा।
किसी भी देशभक्त भारतीय की तरह लेखक को भी कश्मीर में लोगों की तकलीफें, और कत्लो-गारत देख कर तकलीफ होती है। पर वहाँ लोग क्यों मारे जा रहे हैं? वहाँ जो अलगाववादी हिंसा हो रही है, उसके कारण वहाँ सेना है, या सेना होने के कारण अलगाववादी हिंसा है? 1989 से पहले तो सब ठीक था। आप ही बतायें, यदि यह जिहाद आज ही समाप्त हो जाए, तो क्या कुछ ही समय में वहाँ से सेना नहीं हटे जायेगी? कश्मीरी अलगाववादियों को इस प्रश्न का उत्तर मालूम है। उन्हें और उनके नेताओं को यह पता है कि वे जिस दिन चाहेंगे उस दिन निर्दोष लोगों की मौतों को रोक सकते हैं। पर अलगाववादियों की सोच यही है कि जब तक असहाय लोग कुरबान नहीं होंगे तब तक निज़ामे-मुस्तफा नहीं मिलेगा।
इतिहास कहता है कि टालमटोल राजनीतिक शक्ति के रहते यह नामुमकिन है किआर या पारजैसा कोई रवैया भारत सरकार अख्तियार करे। शायद इसलिए कश्मीरी मुसलमानों के हित में यही है कि वे यथापूर्व स्थिति को प्राप्त करने का प्रयत्न करेंलड़ाई झगड़ा छोड़ें, भारत के विरुद्ध छिड़ा जेहाद समाप्त करें, स्कूलों, दफ्तरों, सिनेमाओं, खेलगाहों, यहाँ तक कि मैखानों में जाना शुरू करें। जो हिन्दू घाटी छोड़ कर जा चुके हैं, वे तो संभवतः लौटेंगे नहीं। 1989 से पहले जो था, उसे हासिल करें। पर शुरुवात पत्थर-बाज़ी बंद होने से ही हो सकती है।