सोमवार, 29 अगस्त 2011

खुद को बदलो दुनिया स्वत: बदल जाएगी

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। मानव सम वानर से होमोसेपियन तक की मानव की यात्रा अनेकों शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तनों की महागाथा है।विश्व में अनेकों देश हैं जिनमें सहस्त्रों सभ्यताओं एवं संस्कृतियों का जन्म हुआ और समय के साथ उनका पतन भी हुआ। प्रत्येक संस्कृति की उत्पत्ति एवं उसका पतन तत्कालीन प्राकृतिक,भौगौलिक,सामाजिक एवं आर्थिक कारकों पर निर्भर करती है। जहां सकारात्मक परिस्थिति संस्कृति के उत्थान में सहायक होती है वहीं नकारात्मक परिस्थिति पतन को निश्चित कर देती है। यही बात मानव के स्वभाव एवं चरित्र पर भी अक्षरश: लागू होती है। मानव चरित्र में आया थोड़ा सा भी परिवर्तन भी महान सामाजिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार कर देता है। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि प्राचीन काल में,विशेषत: वैदिक काल में,स्त्रियों की सामाजिक स्थिति अत्यंत उच्च थी । किसी भी परंपरागत कृत्य में स्त्रियॉं की उपस्थिति अपरिहार्य थी । परंतु कालांतर में विदेशी आक्रमणों से स्वयं को सुरक्षित रखने की लालसा तथा मानव चरित्र में आए नैतिक पतन के फलस्वरूप स्त्रियाँ भोग की वस्तु बनकर रह गईं । बाल-विवाह,विधवा पुनर्विवाह निषेध,दहेज हत्या एवं अन्य प्रकार की घरेलू हिंसा मानव के चारित्रिक पतन के कुछ उदाहरण मात्र हैं। वर्तमान में स्त्रियों की स्थिति में कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है।वे पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहीं है,इस परिवर्तन के पीछे कानूनी डंडा एक प्रत्यक्ष कारण अवश्य है परंतु सामान्य जनों में आए नैतिक एवं चारित्रिक परिवर्तन सबसे बड़े अप्रत्यक्ष कारण के रूप में उभरते हैं क्योंकि कोई भी व्यवहार , प्रथा या परंपरा में तभी परिवर्तित होता है जबकि उसका निर्वहन सामान्य जनता के बाहुल्य द्वारा नियम के रूप में किया जाता है और स्वेक्षया अपनाया जाता है। वर्तमान युग को अर्थ युग की संज्ञा दी जाती है क्योंकि आर्थिक संपन्नता एवं विपन्नता ही राष्ट्र,राज्य एवं व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का निर्धारण करती हैं। ऐसा नहीं है कि प्राचीन समय में अर्थ की प्रधानता नहीं थी,हालांकि उस समय भी आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन धन ही था परंतु उस समय आवश्यकताएँ सीमित थीं परिणामत: अर्थ का सीधा प्रभाव मानव की चारित्रिक विशेषताओं पर नहीं पड़ता था।वर्तमान में हमें जिस धन-लोलुपता और भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ रहा है उसका प्रमुख कारण मानव चरित्र में घर कर गई अर्थ की प्रधानता की भावना ही है। यदि इस विश्व को मानव रूप में मान लिया जाए तो जिस प्रकार शरीर की इकाई कोशिका होती है उसी प्रकार विश्व की इकाई व्यक्ति को माना जा सकता है।शरीर की कार्यप्रणाली मुख्यत: कोशिकाओं पर ही निर्भर करती है उसी प्रकार संसार की कार्य प्रणाली व्यक्ति रूपी इकाई पर निर्भर करती है। इस प्रकार यदि व्यक्ति रूपी इकाई की सोच में आए सकारात्मक या नकारात्मक परिवर्तनों का निश्चित प्रभाव समाज पर भी पड़ता है।यह माना कि अकेला चना भाड़ नहीं झोंक सकता परंतु एक नई शुरुआत तो कर सकता है। यही परिवर्तन का प्रथम चरण होता है। ज्ञानी को गुण दिखाई देते हैं और अज्ञानी की दृष्टि सदैव दोषों पर रहती है। वस्तु अच्छी या बुरी नहीं होती, हमारे देखने के तरीके अच्छे या बुरे होते हैं। हमारी दृष्टि अच्छी है तो सारी सृष्टि हमें सुंदर नजर आएगी, यदि हमारी दृष्टि खोटी है तो सारी सृष्टि में हमें मात्र खोट ही नजर आएगा। दृष्टि बदलो सृष्टि अपने-आप बदल जाएगी। यह समाज एक दर्पण के समान होता है जैसा हमारा स्वरूप होता है वैसा ही संसार हमें दृष्टिगोचर होता है परंतु स्वयं को बदलना कठिन मानसिक प्रक्रियाओं के दौर से गुज़रना होता है। परंतु किसी भी महान लक्ष्य की प्राप्ति सरलता से नहीं होती उसके लिए आकाश पाताल एक करना पड़ते हैं। सरलता से प्राप्त वस्तु का कोई मोल नहीं होता है। जिस आज़ादी का भोग हम आज कर रहे हैं उसकी प्राप्ति भी सरलता से नहीं हुई है इसी लिए आज यह आवश्यक हो गया है कि प्रत्येक व्यक्ति आत्म मंथन करे और यह शपथ ले कि जिन उच्चादर्शों को सामने रखकर आज़ादी प्राप्त की गई है उनका पालन करे तथा उन्हे अपने में आत्मसात करे।हाल ही में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ सम्पन्न अन्ना का आंदोलन तब तक सफल नहीं होगा जब तक कि प्रत्येक व्यक्ति में अंतर्निहित भ्रष्टाचार की आदत समाप्त नहीं होती। जी हाँ आज भ्रष्टाचार आदत का स्वरूप ले चुका है और कोई भी आदत सरलता से पीछा नहीं छोड़ती,इसे छुड़ाने के लिए भी क्रान्ति की आवश्यकता होती है जिसे आत्म-क्रान्ति की संज्ञा दी जा सकती है।है।इसी लिए प्रथम आवश्यकता स्वयं को बदलने की है , हमारे बदलने से ही दुनियाँ के बदलने की बात सोची जा सकती है।

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